KhatuShyamJi Real Estate Boom: रेलवे स्टेशन से बदलेगी खाटूश्यामजी की तस्वीर, जमीनों के दाम और कारोबार में आ सकता है बड़ा उछाल
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीणधाम का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। इसे नौ देवियों में प्रथम जयंती देवी के शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि लगभग दसवीं शताब्दी में चूरू जिले के घांघू गांव की कन्या जीवणी ने कठोर तपस्या कर स्वयं को मां जयंती की दिव्य ज्योति में समर्पित कर दिया। उसी घटना के बाद यह स्थान जयंती शक्तिपीठ, जीवणी माता का स्थान और समय के साथ अपभ्रंश होकर जीणमाता धाम के नाम से प्रसिद्ध हो गया। आज यह धाम देशभर के श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केन्द्र बना हुआ है।
जीणमाता धाम केवल हिन्दू समाज की आस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह धार्मिक सद्भाव का भी अनुपम उदाहरण है। जनश्रुतियों के अनुसार मुगल बादशाह औरंगजेब ने यहां की दिव्य शक्ति को स्वीकार करते हुए माता को कुलदेवी के रूप में सम्मान दिया तथा मंदिर में छत्र अर्पित किया। अखण्ड ज्योति के लिए दिल्ली दरबार से तेल और घी भेजे जाने की भी मान्यता प्रचलित है। यही कारण है कि यह धाम सदियों से विभिन्न समुदायों के बीच श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक बना हुआ है।
जीणधाम का काजल शिखर भाई-बहन के अमर प्रेम की भावनात्मक गाथा को संजोए हुए है। मान्यता है कि भाई हर्ष से रुष्ट होकर जीवणी यहां आकर बैठ गईं और उनके नेत्रों से बहते अश्रुओं ने इस स्थान को पवित्र बना दिया। आज यही स्थान काजल शिखर के रूप में पूजनीय है, जहां पाराशर ब्राह्मण परंपरागत रूप से पूजा-अर्चना और व्यवस्थाएं संभालते हैं। सामने स्थित पर्वत पर हर्ष ने भगवान शिव की कठोर तपस्या कर दिव्य स्वरूप प्राप्त किया और आज वे हर्षनाथ भैरव के रूप में पूजे जाते हैं।
- काजल शिखर
- हर्षनाथ भैरव मंदिर
- भंवरा माता मंदिर
- प्राचीन शिवालय
- नया हर्षनाथ मंदिर
- पवित्र जीणकुंड
ये सभी स्थल श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करते हैं।
चैत्र और आश्विन नवरात्रों के दौरान जीणमाता धाम में विशाल लक्खी मेले का आयोजन होता है। राजस्थान ही नहीं, बल्कि देशभर से लाखों श्रद्धालु माता के दर्शन, जात-जडूला, सवामणी, नवजात शिशुओं के संस्कार तथा पारिवारिक धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न करने यहां पहुंचते हैं। पूरा धाम "जय माता दी" के जयघोष से भक्तिमय हो उठता है।
जीणमाता धाम जयपुर से लगभग 120 किलोमीटर, सीकर से 30 किलोमीटर, खाटूश्यामजी से लगभग 23 किलोमीटर, सालासर से लगभग 85 किलोमीटर तथा हर्षनाथ पर्वत से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जयपुर-सीकर राष्ट्रीय राजमार्ग से गोरियां होकर पक्की सड़क के माध्यम से मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। निजी वाहनों के साथ-साथ सीकर, गोरियां और दांतारामगढ़ से नियमित बस सेवाएं भी उपलब्ध रहती हैं।
नियमित आरती एवं दर्शन व्यवस्था
मंगला आरती: प्रतिदिन प्रातः 4:00 बजे
प्रातःकालीन श्रृंगार एवं भोग:
- गर्मियों में प्रातः 7:00 बजे
- सर्दियों में प्रातः 8:00 बजे
सायंकालीन आरती एवं भोग:
- गर्मियों में सायं 7:15 बजे
- सर्दियों में सायं 6:15 बजे
दर्शन समय:
- गर्मियों में प्रातः 4:00 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक
- सर्दियों में प्रातः 4:30 बजे से रात्रि 9:30 बजे तक
श्री जीणमाता धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, सनातन परंपरा और शक्ति उपासना का दिव्य केन्द्र है। यहां आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु माता के दरबार से आत्मिक शांति, नई ऊर्जा और अटूट विश्वास लेकर लौटता है। अरावली की गोद में विराजमान यह पावन धाम आज भी करोड़ों भक्तों के लिए आस्था, विश्वास और भक्ति का अमिट प्रतीक बना हुआ है।
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